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30 अक्टूबर, 2025

ओम या ॐ के 10 रहस्य और चमत्कार

ओम या ॐ के 10 रहस्य और चमत्कार


1. नाद : इस ध्वनि को कहते हैं। अनाहत अर्थात जो किसी आहत या टकराहट से पैदा नहीं होती बल्कि स्वयंभू है। इसे ही नाद कहा गया है। ओम की ध्वनि एक शाश्वत ध्वनि है जिससे ब्रह्मांड का जन्म हुआ है। एक ध्वनि है, जो किसी ने बनाई नहीं है। यह वह ध्वनि है जो पूरे कण-कण में, पूरे अंतरिक्ष में हो रही है और मनुष्य के भीतर भी यह ध्वनि जारी है। सहित ब्रह्मांड के प्रत्येक गृह से यह ध्वनि बाहर निकल रही है।

2. ब्रह्मांड का जन्मदाता : पुराण मानता है कि नाद और बिंदु के मिलन से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। नाद अर्थात ध्वनि और बिंदु अर्थात शुद्ध प्रकाश। यह ध्वनि आज भी सतत जारी है। ब्रह्म प्रकाश स्वयं प्रकाशित है। परमेश्वर का प्रकाश। इसे ही शुद्ध प्रकाश कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड और कुछ नहीं सिर्फ कंपन, ध्वनि और प्रकाश की उपस्थिति ही है। जहां जितनी ऊर्जा होगी वहां उतनी देर तक जीवन होगा। यह जो हमें सूर्य दिखाई दे रहा है एक दिन इसकी भी ऊर्जा खत्म हो जाने वाली है। धीरे-धीरे सबकुछ विलिन हो जाने वाला है। बस नाद और बिंदु ही बचेगा।

3. ओम शब्द का अर्थ : ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म...। इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। अ मतलब अकार, उ मतलब ऊंकार और म मतलब मकार। 'अ' ब्रह्मा का वाचक है जिसका उच्चारण द्वारा हृदय में उसका त्याग होता है। 'उ' विष्णु का वाचक हैं जिसाक त्याग कंठ में होता है तथा 'म' रुद्र का वाचक है और जिसका त्याग तालुमध्य में होता है।

4. ओम का आध्यात्मिक अर्थ : ओ, उ और म- उक्त तीन अक्षरों वाले शब्द की महिमा अपरम्पार है। यह नाभि, हृदय और आज्ञा चक्र को जगाता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है। ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ दिए गए हैं।
5. मोक्ष का साधन : ओम ही है एकमात्र ऐसा प्रणव मंत्र जो आपको अनहद या मोक्ष की ओर ले जा सकता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार मूल मंत्र या जप तो मात्र ओम ही है। ओम के आगे या पीछे लिखे जाने वाले शब्द गोण होते हैं। प्रणव ही महामंत्र और जप योग्य है। इसे प्रणव साधना भी कहा जाता है। यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण, कैवल्य ज्ञान या मोक्ष की अवस्था का प्रतीक है। जब व्यक्ति निर्विचार और शून्य में चला जाता है तब यह ध्वनि ही उसे निरंतर सुनाई देती रहती है।

6. प्रणव की महत्ता : शिव पुराण में प्रणव के अलग-अलग शाब्दिक अर्थ और भाव बताए गए हैं- 'प्र' यानी प्रपंच, 'ण' यानी नहीं और 'व:' यानी तुम लोगों के लिए। सार यही है कि प्रणव मंत्र सांसारिक जीवन में प्रपंच यानी कलह और दु:ख दूर कर जीवन के अहम लक्ष्य यानी मोक्ष तक पहुंचा देता है। यही कारण है ॐ को प्रणव नाम से जाना जाता है। दूसरे अर्थों में प्रणव को 'प्र' यानी यानी प्रकृति से बने संसार रूपी सागर को पार कराने वाली 'ण' यानी नाव बताया गया है। इसी तरह ऋषि-मुनियों की दृष्टि से 'प्र' अर्थात प्रकर्षेण, 'ण' अर्थात नयेत् और 'व:' अर्थात युष्मान् मोक्षम् इति वा प्रणव: बताया गया है। जिसका सरल शब्दों में मतलब है हर भक्त को शक्ति देकर जनम-मरण के बंधन से मुक्त करने वाला होने से यह प्रणव: है।

7. स्वत: ही उत्पन्न होता है जाप : ॐ के उच्चारण का अभ्यास करते-करते एक समय ऐसा आता है जबकि उच्चारण करने की आवश्यकता नहीं होती आप सिर्फ आंखों और कानों को बंद करके भीतर उसे सुनें और वह ध्वनि सुनाई देने लगेगी। भीतर प्रारंभ में वह बहुत ही सूक्ष्म सुनाई देगी फिर बढ़ती जाएगी। साधु-संत कहते हैं कि यह ध्वनि प्रारंभ में झींगुर की आवाज जैसी सुनाई देगी। फिर धीरे-धीरे जैसे बीन बज रही हो, फिर धीरे-धीरे ढोल जैसी थाप सुनाई देने लग जाएगी, फिर यह ध्वनि शंख जैसी हो जाएगी और अंत में यह शुद्ध ब्रह्मांडीय ध्वनि हो जाएगी।

8. शारीरिक रोग और मानसिक शांति हेतु : इस मंत्र के लगातार जप करने से शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलती है। दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होता है। इससे शारीरिक रोग के साथ ही मानसिक बीमारियां दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं।
9. सृष्टि विनाश की क्षमता : ओम की ध्वनि में यह शक्ति है कि यह इस ब्रहमांड के किसी भी गृह को फोड़ने या इस संपूर्ण ब्रह्मांड को नष्ट करने की क्षमता रखता है। यह ध्वनि सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और विराट से भी विराट होने की क्षमता रखती है।

10. शिव के स्थानों पर होता रहता है ओम का उच्चारण : सभी ज्योतिर्लिंगों के पास स्वत: ही ओम का उच्चारण होता रहता है। यदि आप कैलाश पर्वत या मानसरोवर झील के क्षेत्र में जाएंगे, तो आपको निरंतर एक आवाज सुनाई देगी, जैसे कि कहीं आसपास में एरोप्लेन उड़ रहा हो। लेकिन ध्यान से सुनने पर यह आवाज 'डमरू' या 'ॐ' की ध्वनि जैसी होती है। वैज्ञानिक कहते हैं कि हो सकता है कि यह आवाज बर्फ के पिघलने की हो। यह भी हो सकता है कि प्रकाश और ध्वनि के बीच इस तरह का समागम होता है कि यहां से 'ॐ' की आवाजें सुनाई देती हैं।

रामेश्वर नाथ तिवारी:अपने बारे मेंमेरा जन्म 1.10.1960...को उत्तर प्रदेश के जनपद देवरिया अंतर्गत ग्राम टैरिया, पत्रालय–सोहनाग, तहसील–सलेमपुर में हुआ। मेरे पिताजी स्व. श्री अवधेश कुमार तिवारी शिक्षा जगत से जुड़े रहे। वे प्राइमरी स्कूल तिलौली, सोहनाग में सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्त हुए, तत्पश्चात प्रधान अध्यापक बने और अंततः जूनियर हाई स्कूल सोहनाग से सहायक अध्यापक के पद से सेवानिवृत्त हुए।सेवानिवृत्ति के पश्चात पिताजी ने अपना सम्पूर्ण जीवन ईश्वर-भक्ति और काव्य-सृजन को समर्पित कर दिया। उनका आध्यात्मिक उत्कर्ष इतना गहन था कि वे संसार को माया मात्र मानने लगे। आज भी जब जीवन में दुःख या चिंता घेरती है, उनकी कविताएँ मुझे अद्भुत शांति और दिव्य दृष्टि प्रदान करती हैं—“देख रहा हूँ सपना क्या है?सपना है तो अपना क्या है?”मेरा पैतृक ग्राम टैरिया विशुद्ध ग्रामीण परिवेश में स्थित है, जो सलेमपुर से मात्र 3 किमी तथा प्रसिद्ध परशुराम धाम, सोहनाग से लगभग 2 किमी की दूरी पर स्थित एक ऐतिहासिक-धार्मिक क्षेत्र है।मेरे नाना पंडित रामचन्द्र शर्मा प्रख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे तथा पितामह पंडित श्री सीताराम तिवारी भारतीय रेल में कार्यरत रहे—वे अत्यंत दयालु और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे।शिक्षा की शुरुआत सोहनाग के प्रसिद्ध प्राइमरी स्कूल से पाँचवीं तक तथा जूनियर हाई स्कूल सोहनाग से आठवीं तक हुई। इसके पश्चात गौतम इंटर कॉलेज, पिपरा रामधर से हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इंटरमीडिएट में जनपद में प्रथम स्थान प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। आगे गोरखपुर विश्वविद्यालय में बी.ए. में प्रवेश लिया और विश्वविद्यालय स्तर पर भी प्रथम स्थान प्राप्त किया। वर्ष 1978 में अंग्रेज़ी, संस्कृत एवं भूगोल विषयों से बी.ए. प्रथम श्रेणी तथा 1980 में एम.ए. (भूगोल) उत्तीर्ण किया।मदन मोहन मालवीय डिग्री कॉलेज, भाटपार रानी में लेक्चररशिप न मिल पाने पर गाँव छोड़ने का निर्णय लिया और पुणे, महाराष्ट्र को अपनी कर्मभूमि बनाया। कॉर्पोरेट क्षेत्र में 25 वर्षों तक कार्य करते हुए ग्रुप जनरल मैनेजर के पद तक पहुँचा। इस अवधि में एक मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट की स्थापना फाउंडर ट्रस्टी के रूप में की।इसके पश्चात इंदिरा ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट्स में डिप्टी डायरेक्टर (एडमिनिस्ट्रेशन एवं HR) के रूप में साढ़े आठ वर्षों तक सेवा दी, जहाँ केजी से पीजी तक—मैनेजमेंट, इंजीनियरिंग, फार्मेसी आदि की शिक्षा प्रदान की जाती है।वर्तमान में सेवानिवृत्त जीवन बड़े आनंद, संतोष और आत्मचिंतन के साथ व्यतीत हो रहा है—जहाँ अनुभव स्मृति बनते हैं और स्मृतियाँ साधना।

रामेश्वर नाथ तिवारी अपने बारे में मेरा जन्म    तेरह जनवरी  उन्नीस सौ उनसठ को   ग्राम  टैरिया  , पत्रालय - सोहनाग...