24 मई, 2013

फिराक गोरखपुरी की ग़ज़ल




रुकी रुकी सी शब-ए-मर्ग ख़त्म पर आई
वोह पौ फटी, वोह नयी ज़िंदगी नज़र आई


ये मोड़ वोह है कि परछाईयाँ भी देंगी न साथ
मुसाफिरों से कहो, उसकी रहगुज़र आई


फिज़ा तबस्सुम-ए-सुबह-ए-बहार थी, लेकिन
पोहंच के मंजिल-ए-जानाँ पे आँख भर आई


कहाँ हर एक से इंसानियत का बार उठा
कि ये बला भी तेरे आशिकों के सर आई


ज़रा विसाल के बाद आईना तो देख ऐ दोस्त
तेरे जमाल की दोशीज़गी निखर आई


फ़िराक गोरखपुरी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

मेरा ब्लॉग

यह रही आपकी ब्लॉग पोस्ट “जीवन के महान रहस्य-सम्पूर्ण ज्ञान” का मूल पाठ (जो आपने लिंक किया था): � Rntiwari1 📌 मुख्य बिंदु: • जीवन का रहस्य भ...