25 जनवरी, 2011

पिताजी की डायरी से.......22/05/1995




पिताजी की डायरी से.......

मनुष्य में कुछ भावनाएं स्थाई रूप से रहती हैं. उन भावनाओं में परिवर्तन धीरे धीरे आता है.एक लम्बे समय के बाद उसके स्थान पर दूसरी भावना आती है.प्राचीन काल में भारतीय भावना यही रहती थी की ईश्वर को प्रसन्न रखना है. जिसके परिणाम स्वरुप वह सदगुणों के तरफ अग्रसर  था. एस प्रकार उसका समाजी जीवन बड़ा ही उत्तम था.
विदेशों में विज्ञानं का जन्म बताया जाता है,इसका कारन ईश्वर के प्रति अज्ञान या अविश्वास भी हो सकता है.विज्ञानं स्वतः राक्षश   है,आत्म ज्ञान देवता है.यह राक्षश अदृश्य के माध्यम से ही विकसित हुआ और भारत पर भी अपना अधिक कर लिया .भारत में भी राजनितिक नेताओ का जन्म होने लगा और भारत को आजाद कराने में नेताओं जो भूमिका अदा की उससे सभी भारत वासी उनके पीछे आ गए. आम जनता ने  उनके प्रति विश्वास प्रकट किया ,एस प्रकार उन्होंने प्राचीन परंपरा को तोड़ कर इश्वरीय नियमो के विरुद्ध संबिधान बनाया . विज्ञानं और संबिधान दोनों ने प्रदुषण फैलाना शुरू कर दिया जिसके फलस्वरूप पृथ्वी से जुदा होने की स्थिति आ गयी है.आज की परिस्थितियों को देखते हुए भविष्य का अंदाजा लगाया जा सकता है.मुख्य लीला भारत की ही होती है इस पर किसी को   विचार करने का तथा निर्णय लेने का अधिकार मिल जाय तो उसे क्या सोचना चाहिए..? मनुष्य जाति का हित किसमे होगा ? लीला को आगे बढ़ाने में या यहीं विराम देने में.फिर लीला आगे बढ़ाने से क्या लाभ , परेसानियाँ और बढ़ती जाएगी .
भव सागरीय   प्रतेक   बातें झूठी हैं ,उन्हें झूठ समझने की कोशिस की जाय और आत्मा को पहचान कर सत्य को पहचाना जाय. सत्य में ही विश्वास किया जाय . झूठ को अपने से अलग रखेगे तो सत्य की ओर अपने आप बढ़ते जायेंगें ..
----अवधेश कुमार तिवारी
२२/०५/१९९५

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