21 मई, 2012

निति वाक्य

हौं केहिको का मित्र को, कौन काल अरु देश।
लाभ खर्च को मित्र को, चिंता करे हमेशा।

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अभी समय कैसा है? मित्र कौन हैं? यह देश कैसा है? मेरी कमाई और खर्च क्या हैं? मैं किसके अधीन हूं? और मुझमें कितनी शक्ति है? इन छ: बातों को हमेशा ही सोचते रहना चाहिए।आचार्य चाणक्य कहते हैं कि वही व्यक्ति समझदार और सफल है जिसे इन छ: प्रश्नों के उत्तर हमेशा मालुम रहते हो। समझदार व्यक्ति जानता है कि वर्तमान में कैसा समय चल रहा है। अभी सुख के दिन हैं या दुख के। इसी के आधार पर वह कार्य करता हैं। हमें यह भी मालुम होना चाहिए कि हमारे सच्चे मित्र कौन हैं? क्योंकि अधिकांश परिस्थितियों में मित्रों के वेश में शत्रु भी आ जाते हैं। जिनसे बचना चाहिए।
लुब्धमर्थेन गृहणीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा।
मूर्खं छन्दानुवृत्या च यथार्थत्वेन पण्डितम्।।

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अर्थात् जो लोग लालची हैं उन्हें धन से वश में करें, जो लोग घमंडी हैं उन्हें मान-सम्मान देकर, जो मूर्ख हैं उन्हें प्रशंसा करके और जो लोग विद्वान हैं उन्हें ज्ञान की बातों से वश में किया जा सकता है।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जो लोग लालची होते हैं उनका मोह सिर्फ धन में ही होता है। ऐसे लोगों से कुछ काम करवाना हो तो धन देकर ही करवाया जा सकता है। धन देखते ही ये लोग वश में हो जाते हैं। जो लोग अभिमानी और घमंडी स्वभाव के हैं उन्हें मान-सम्मान देकर वश में किया जा सकता है। मूर्ख लोग जिद्दी स्वभाव के होते हैं अत: इन्हें वश में करने के लिए वैसा ही करें जैसा वे चाहते हैं। साथ ही इनकी झूठी प्रशंसा करें। ये लोग वश में हो जाएंगे। इनके अतिरिक्त जो लोग समझदार हैं, विद्वान हैं उन्हें वश में करने के लिए ज्ञान की बातों का सहारा लेना चाहिए। विद्वान लोगों ज्ञानी व्यक्ति के वश में हो जाते हैं।

जो काम सिर्फ खुद के लिए किए जाते हैं वे पशुवत कर्म माने गए हैं क्योंकि अपने लिए तो सिर्फ जानवर ही जीते हैं। अगर हम मनुष्य हैं, तो उसमें हमारा मनुष्यत्व छलकना चाहिए।

रामायण में भरत का चरित्र यह सिखाता है। राम को वनवास हो गया और राज्य भरत को मिला। राम की भी आज्ञा थी और पिता दशरथ की भी कि भरत अयोध्या के राजा बनकर राज्य चलाएं लेकिन भरत ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने इस बात पर गहराई से विचार किया कि भले ही अयोध्या का राजा बनना उनके लिए धर्म सम्मत है लेकिन इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे। उन्होंने राजा बनना स्वीकार नहीं किया। अपने उस कर्तव्य को महत्व दिया जो उनका राम के प्रति था।
 क्या संभव है कि हम कर्म के बिना इस दुनिया में रह पाएं। हमें कुछ तो करना ही पड़ेगा। जीवन के लिए सांस लेना भी एक कर्म ही है। हम कर्म करने के लिए बाध्य हैं लेकिन प्रकृति ने हमें अपने कर्म को चुनने की स्वतंत्रता दी है।
हम कौन सा काम चुनते हैं यह हम पर ही निर्भर करता है। प्रकृति सिर्फ हमारे निर्णय पर प्रतिक्रिया देती है, और वह प्रतिक्रिया हमारे कर्म के परिणाम के रूप में सामने आती है। यहीं से शुरू होती है हमारे कर्तव्यों की बात। हमारा पहला कर्तव्य क्या है। कर्म का चयन हमारा पहला कर्तव्य है। हम जब भी अपने लिए कोई मार्ग चुनें तो सिर्फ खुद को ध्यान में रखकर नहीं। वरन हमसे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जुड़े हर व्यक्ति के बारे में अच्छे से विचार कर के ही चुने।
हम अक्सर इस उलझन में रहते हैं कि हमारा कर्तव्य क्या है। जो किताबी बातें हैं वो कर्तव्य है या जिन परिस्थितियों से हम गुजर रहे हैं, उसमें हमारी भूमिका कर्तव्य है। अधिकतर बार ऐसा होता है कि यह समझने में ही सारा वक्त गुजर जाता है कि हम करें क्या। क्या करें, क्या न करे, क्या सही है और क्या गलत है, किस कार्य को करने से धर्म की, नैतिकता की और इंसानियत की मयार्दा का उल्लंघन होता है?

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