26 अप्रैल, 2012







भाग्य !!!


अगर हम घर के मुखिया हैं तो हमारे विचारों की गहरी छाप परिवार पर भी दिखेगी। किस्मत पर यकीन करें लेकिन हमेशा भाग्यवादी बने रहना, हमारी भावी पीढिय़ों को आलसी और अशांत बना देगा।

भाग्य के भरोसे तब बैठें जब हम अपनी ओर से हर ईमानदार प्रयास कर चुके हों। बिना प्रयास किए भाग्य के भरोसे रहना ना सिर्फ खुद के प्रति बेइमानी होगा, बल्कि सृष्टि के नियमों की भी अवहेलना होगी। हमारे शास्त्र कर्म पर जोर देते हैं, आदमी को कर्मवादी बनाते हैं। राम से लेकर कृष्ण तक हर अवतार ने कर्म को ही महत्व दिया है।

भागवत हमें जीवन हर पहलू का व्यवहारिक ज्ञान देता है। इस ग्रंथ में खुद भगवान कृष्ण जो संपूर्ण 16 कलाओं के अवतार थे, जिनके लिए कोई भी काम सिर्फ सोचने मात्र से हो सकता था, उन्होंने भी वो सारे कर्म किए जो एक आम आदमी को करने चाहिए। उनके जन्म के साथ ही उनके सर्वशक्तिमान होने की घोषणा कर दी गई थी। लेकिन भगवान ये जानते थे कि उन्हें संदेश क्या देना है।

खुद उनके परिवार में उन्होंने कभी ये जाहिर नहीं होने दिया कि सारी सृष्टि उनके अधीन है। वे हमेशा कर्म पर ही टिके, कर्म की ही शिक्षा दी। वे सर्व ज्ञानी थे फिर भी सांदीपनि ऋषि से 64 कलाओं का ज्ञान लिया, वे अकेले महाभारत युद्ध को एक दिन में जीत सकते थे लेकिन उन्होंने सिर्फ पांडवों का मार्गदर्शन किया और ये संदेश दिया कि परमात्मा सिर्फ राह दिखा सकता है, हर आदमी को अपना संघर्ष खुद ही करना पड़ेगा।

हम परिवार में रहते हैं, हमारे किसी भी काम से ये संदेश ना जाए, इसका ध्यान रखें। आपकी पीढिय़ां, परिवार आपके बताए मार्ग पर चलेगा। भाग्य को उतना ही महत्व दें, जितना जरूरी है। परिवार अगर भाग्यवादी हो गया तो फिर अशांति, संघर्ष और बिखराव भी आना तय है। अपने परिवार को कर्म के प्रति जागरुक करें, भाग्य सिर्फ एक रास्ता है, इसे आसान या मुश्किल बनाना हमारे कर्म पर निर्भर करता है। इसी शिक्षा से परिवार की भावी पीढिय़ां सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ेंगी।

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