15 मई, 2011

ज्ञान का दीप



ज्ञान का  दीप
जिंदगी
प्रेम में ही  गर  मिली रह गयी,
ज्ञान का दीप कैसे जला पाओगे ?
घर में ही अँधेरा घुसा रह गया,
व्यर्थ में ही सितम को सजा पाओगे .
प्रेम साथी है केवल चमन के लिए,
ज्ञान दीपक जलाना गमन के लिए.
प्रेम बंधन में यदि तुम बंधे रह गए,
क्या सोये हुए को जगा पाओगे?
जगाओगे जब भी होगी दिवाली,
रातें बनेगीं सारी उजाली .
उजाले में रहते सबेरा हुवा  तो ,
हर बंधनों को खुला पाओगे.
ख़तम हो चुकी हैं शीतल हवाएं,
तपती हुयी आग शोले गिराए,
यह सूचना है तेरी जिंदगी का,
खिज़ा के ही मौसम में ही पाओगे.
अभी वक्त है ज्ञान दीपक जलाना,
उठो और चलो तुमको मंजिल है पाना,
कहीं से ढिलाई कभी आगई तो ,
कैसे के डोली सजा पाओगे ?


आर.एन. तिवारी




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