27 जनवरी, 2011

पिता जी की डायरी से....





ऊंची अटरिया पे पलंग बिछाके
सुतल हो गोरी दुश्मन जगा के ।
अपने पिया संग राखे ना मिताई
सखिया सहेली संग बीते तरुणाई।
घुमेली बजरिया में घूँघट लगाके
सुतल हो ...........।
बड चंचल बाटे दुश्मनवा
हर छन दवुरत सकल जहनवा।
सोबत ही जइहे दगिया लगाके
सुतल हो ...........।
एक दिन जायेके परिहे गवनवा
चुंदर मैली ना रीझे सजनवा।
झरे लागे नीर नैनवा में आके
सुतल हो ...........।
जागत रहबू सुतिहे दुश्मनवा
मौन बतिया मान मिलिहे सजनवा ।
अपने पिया संग घूँघट हटाके
सुतल हो ...........।

--अवधेश कुमार तिवारी

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