04 मई, 2010

तब और अब




 कुशल क्षेम  पूछत रहे , दिल में राखी सनेह I
चले गए वे लोग सब, तजि मानुष के देह II
समय समय का खेल यह, भला बुरा न होय I
कारन सदा अदृश्य है, जनि सके न कोय II
चला गया सो चला गया , वर्तमान को जान I
आगे क्या फिर आएगा , उसको भी पहचान II
दिखत है सो कुछ नहीं, ना दिखत सो होय I .
भ्रम में सारा जगत है, अंधी अंखिया दोय II.
जानत हूँ सो कह दिया, भरा जहाँ अज्ञान I.
अभिमानी वह बन गया, झूठा भरा है शान.II
जहाँ शान तंह मान नहीं,मान जहाँ नहीं शान I.
आस पास में बस रहा जग प्यारा भगवान् II.
शान देख कर जानिए, राक्षस का अधिकार I.
राम सर्वदा दूर है , पा न सकेगा प्यार II.
हंसा था सरवर गया, सुगना गया पहाड़ I.
जाहू विप्र घर आपने, मंत्री काग सियार II.
हंश बढ़ाया हाथ जब , जा गिद्धों के राज I.
अपना हाथ बधाएये, रख दोनों की लाज II.
सोचा गिद्ध अच्छा हुआ ,मुझे चाहिए आँख I.
वह  देने ही आ गया, जम गयी मेरी साख II.
--अवधेश कुमार तिवारी



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